दृष्टि बदलो, समाज बदल जाएगा
डा० मदन चन्द्र करण
(अंतरराष्ट्रीय कवि एवं प्रोफेसर)
कपड़ों से नहीं, चरित्र से पहचान होती है,चेहरों से नहीं, इंसानियत से शान होती है।
जिस्म को देखकर फ़ैसले सुनाने वालों,कभी रूह की भी अपनी एक ज़ुबान होती है।
जो अँधेरों में चुपचाप सौदे कर आते हैं,सुबह वही समाज के रखवाले कहलाते हैं।
जिसे तुमने बाज़ार का नाम देकर ठुकराया,कभी उसकी मजबूरी ने ही उसे वहाँ पहुँचाया।
नारी हर रूप में केवल सम्मान माँगती है,माँ, बहन, पत्नी, प्रेयसी बनकर जीवन सजाती है।
दोष अकेला कभी एक पक्ष का नहीं होता,ताली बजने के लिए दो हाथों का संग होता।
फिर भी अक्सर पत्थर केवल नारी पर गिरते हैं,पुरुष अपने अपराध छुपाकर भी बच निकलते हैं।
समाज का आईना वैसा ही चेहरा दिखाता है,जैसी हमारी दृष्टि होती है, वैसा ही जग नज़र आता है।
दूसरों पर उँगली उठाने से पहले स्वयं को देखो,हर पाप की परछाई में अपना अंश भी परखो।
इंसान को इंसान समझना ही सबसे बड़ी साधना है,सम्मान, करुणा और प्रेम—यही सच्ची आराधना है।
दृष्टि बदलो, विचार बदलो, फिर युग बदल जाएगा,मनुष्य यदि मानव बन जाए—तो समाज सँवर जाएगा।
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