हिन्दी भक्ति गीत
Dr. Madan Chandra Karan
“मैं नहीं, तुम दयामय”
(मुखड़ा)
भरत राजा कहे—
मैं कुछ नहीं रे, मैं कुछ नहीं।
अंतर-बाहर जहाँ निहारूँ,
केवल दयामय, केवल दयामय।।
१
राज-पाट, वैभव, मान-अभिमान
क्षणभंगुर सब माया।
चरणों में अर्पित कर दूँ सब—
तुम ही सत्य-सहाया।
मैं दास तुम्हारे नाम का,
मेरा कुछ भी न होय—
अंतर-बाहर देखूँ केवल
तुम दयामय होय।।
(मुखड़ा)
२
दुख की रजनी, सुख का सवेरा—
तुम ही दीपक ज्योति।
जन्म-मरण की धारा में तुम
शाश्वत प्रेम-प्रकृति।
अहंकार का आवरण टूटा,
चित्त हुआ निर्भय—
अंतर-बाहर प्रकट हुआ
तुम दयामय ही दयामय।।
३ (आध्यात्मिक समापन)
जो कुछ दिखे इस जगत-भुवन में
सब तेरा विस्तार।
जीव-ब्रह्म एक तत्व अमर—
भक्ति ही आधार।
मैं नहीं प्रभु, तुम ही सर्वस्व—
यह सत्य हृदय संजोय,
अंतर-बाहर अनुभव में
दयामय ही दयामय।।
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