फिर अगर जीवन मिले
✍️ कवि : डॉ. मदन चन्द्र करन
(अंतरा 1)
फिर अगर जीवन मुझे मिले,
तुम्हें ही मैं फिर से चाहूँगा।
जैसे सूरज चाहे भोर को,
जैसे चाँद समुंदर में खो।
फिर अगर जीवन मुझे मिले,
तुम्हें ही मैं फिर से चाहूँगा।।
(मुखड़ा)
ओ प्रीतम, ओ सपनों के साथी,
तुम हो मेरी साँसों की थाती।
जैसे नदी पुकारे सागर,
वैसे ही मैं तुम्हें पुकारूँ बारम्बार।।
(अंतरा 2)
फूल अधूरे झरते रहे,
मन के आँचल भरते रहे।
आँधी बनकर तुमने तोड़ा,
फिर भी दिल ने तुमको जोड़ा।
फिर अगर जीवन मुझे मिले,
तुम्हें ही मैं फिर से चाहूँगा।।
(मुखड़ा दोहराएँ)
ओ प्रीतम, ओ सपनों के साथी,
तुम हो मेरी साँसों की थाती।
जैसे नदी पुकारे सागर,
वैसे ही मैं तुम्हें पुकारूँ बारम्बार।।
(अंतिम भाव)
विधाता से मैं सब छिपाऊँ,
बस तुझको हर जन्म में पाऊँ।
फिर अगर जीवन मुझे मिले,
तुम्हें ही मैं फिर से चाहूँगा।।
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